Sunday, 12 August 2012

आहटें


क्यूँ आज दिल फिर तड़प उठा है,
किसी की आने की आहटें हैं,
वो शाम लौटे वो रात लौटे,
यही गुज़ारिश किये हुए हैं,

वो सिलवटें जो हैं दिल में कायम,
धड़क रहीं हैं तेरी छुअन को,
पलक मेरी राहों में बिछी है,
कदम बड़ा आजा पास आ तू,
पिघल रही हूँ मै मोम बनकर,
सजा दे मुझको नए रूप में,
तू अपने दिल का करार दे दे,
मेरे दिल की तू आह ले ले,

क्यूँ आज दिल फिर तड़प उठा है,
किसी की आने की आहटें हैं,
वो शाम लौटे वो रात लौटे,
यही गुज़ारिश किये हुए हैं ...

पलकों से ना लगाया करो

झूठ ना कहने लगें हम,
इतना ना आजमाया करो,
क़दमों पे रखते हैं जगह,
पलकों से ना लगाया करो,

देखा करो बस दूर से हमको,
सीने से यूँ ना लगाया करो,
हम तो लुटेरे हैं दिल के,
यूँ घर ना हमें ले जाया करो ...

लोग पत्थर हैं


ज़रा ज़रा सी बात का तमाशा किये हैं सब,
दिल है नाज़ुक मेरा लोग पत्थर हैं,

किस किस के गिरेबाँ में झाँक कर देखिये,
लब पर हँसी इनके हाथों में खंजर है,

खिलते हैं जो रंगीन फूल इनके बगीचों में,
खून-ए-दिल मेरा उनके अन्दर है,
मै तो खामोश रहती हूँ ये सोच कर,
जाने किस किस की नज़र अब मुझपर है,

उम्र बीत रही है कितने कारवाँ चले गए,
जाने किस उलझन में हम अब भी कैद हैं,

कर दिया तो हमने सब का हिसाब है,
फिर भी ना जाने कितनो के कर्ज़दार हैं,

कुछ अजब ज़िन्दगी के फलसफे से हैं,
नज़दीक हैं जो मेरे वही दिल से दूर हैं ...

चेहरा-ए-खास

भूले ही कभी कोई इस घर तक आया होगा
आवाज़ लगाई होगी दरवाज़ा खटखटाया होगा
उन दस्तकों से कोई जवाब ना पाया होगा
मायूस वो फिर अपने रास्ते लौट आया होगा ...
इस घर में रहती तन्हाई का आलम-ए-गम
उस अंजान के कदमों से वाबस्दा नहीं होगा
यूँ तो खिड़कियों से रोज़ झाँकता एक साया (बाहर को)
जाने किस चेहरा-ए-खास को पहचानता होगा  ...

Wednesday, 18 April 2012

मुलाकात



 
आज मुलाकात हो गयी उनसे,
वो वही थे पर हम बदल गए,
उनके देखने का अंदाज़ वही था,
पर निगाहें हमारी बदल गयीं,

हम तो अब भी गुलिस्तान हैं,
सेहरा में वो उजड़ गए,
हमने फूलों को सजाया,
और उनके लिए कांटें पिरो गए,  

ज उनको खुलकर देखा हमने,
बंदगी से सर झुका दिया,
इतने मिले उनके हालत हमसे,
हम हैं वो और वो हम ऐसा लगा,

खोला जो दिल उनका,
मिले कुछ पुराने किस्से,
कुछ हमारी शिकायतें,
और कुछ बेवफाई,

सहेज कर रखतें हैं वो,
तमाम उम्र का हिसाब,
किसने दिया कितना दिया,
ये उनको नहीं है याद,

मेरे क़दमों की छाप,
आज भी है उनके दर पे,
कितने बरसों से उनने,
सफाई नहीं की घर की,

जिस आईने में उनने,
देखा था मुझको,
मुद्दतों बाद भी वो तस्वीर,
कायम है अब तक,

जिस जगह बैठे थे,
साँथ हम कभी,
उनने यादों की एक,
चादर सी डाल रक्खी है,

दी कसम हमने थी कभी,
उनको न रोने की,
उनने वादा तो किया पूरा,
ऑंखें पथरा सी रक्खी हैं,

मुस्कुरातें हैं मगर,
वो ख़लिश झलक जाती है,
जो दिन गुज़रे बिना मेरे,
वो कमी तडपाती हैं,

आज मुलाकात हो गयी उनसे,
वो वही थे पर हम बदल गए,
उनके देखने का अंदाज़ वही था,
पर निगाहें हमारी बदल गयीं,.........................(इंदु)

तेरे बिन जीना



 
तुम तो कहते थे की वक़्त कट जायेगा,
पर ये न कहा की तेरे बिन जीना है,
हालाते आंधियों को सहना है,
पर अकेले तेरे बिन जीना है,

कहाँ से लाऊं तेरा जैसा होंसला,
दर्द में जीने के वो फलसफे,
कुछ कही अनकही लोगों की,
सहना और चुप रहना,

कहाँ से लाऊं हंसी तेरी वो,
कहाँ से लाऊं रोना,
चुप चुप के वो इशारे करना,
जुबाँ से कुछ न कहना,

पलकों पर तेरी पलकें गिरना,
धड़कन का वो मचलना,
साँसों की हर एक महक को,
सीने से लगा कर रखना,

हँसती हूँ मै तन्हाई में,
सोच के तेरी बातें,
जीना है बस अब है जीना,
पर अकेले तेरे बिन जीना ...............................(इंदु)

साँझ





वो रात की चादर ओड़े अक्सर आती है,
मन के विचलित भावों को मेरे जगाती है,
क्या कहा किया मैंने दिनभर वो पूछे है,
खुद को कितना मजबूर किया वो पूछे है,

वो पूछे है ................(साँझ)

इस दुनिया के रेले में कब तक बहुंगी मै,
कब तक मृगतृष्णा के पीछे पडूँगी मै,
सीने में चुभती है अब ये विस्तृत ख़ामोशी,
कब साँझ तले मै लौट सकूँ इस तूफां से..........................(इंदु)